कांग्रेस और ब्रिटिश राज के बीच असली डील?
कांग्रेस और ब्रिटिश राज के बीच असली डील" वाली बात अक्सर कॉन्स्पिरेसी थ्योरी या राजनीतिक प्रोपेगैंडा के रूप में सामने आती है। कोई ठोस ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है कि इंडियन नेशनल कांग्रेस (INC) और ब्रिटिशों के बीच कोई गुप्त या "असली" डील थी जो आजादी को फर्जी बनाती हो या कांग्रेस को ब्रिटिशों का एजेंट साबित करती हो।
कांग्रेस और ब्रिटिशों की "असली डील" – पूरी अनकही कहानी जो स्कूल की किताबों में नहीं पढ़ाई जाती
आइए इतिहास में वापस चलते हैं।भारत गुलाम है। ब्रिटिश राज पूरे जोर पर। अचानक एक रिटायर्ड अंग्रेज अफसर एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (A.O. Hume) आता है और कहता है – "चलो, भारतीयों को एक पार्टी बनाते हैं – इंडियन नेशनल कांग्रेस!"
अब सवाल ये है – एक अंग्रेज इतना परेशान क्यों होगा भारतीयों के लिए? क्या ये सच में दिल से मदद करना चाहता था... या कुछ और खेल था?
भाग 1: वो "7 सीक्रेट रिपोर्ट्स" वाली कहानी जो गायब हो गईं
ह्यूम ने खुद दावा किया था कि 1878 में उसे गुप्त रूप से 7 मोटी-मोटी रिपोर्ट्स मिलीं। इनमें लिखा था कि भारत में अगले कुछ सालों में 1857 जैसा बड़ा विद्रोह होने वाला है। लाखों लोग उठ खड़े होंगे। ब्रिटिश राज हिल जाएगा।
ह्यूम ने सोचा – अगर भारतीयों का गुस्सा कहीं निकलने का रास्ता न मिला तो बम-बंदूकें चलेंगी। इसलिए एक "सुरक्षित जगह" बनाओ जहां ये पढ़े-लिखे भारतीय सिर्फ मीटिंग करें, भाषण दें, प्रस्ताव पास करें – बस गुस्सा निकल जाए, लेकिन हिंसा न हो।
इसे कहते हैं सेफ्टी वाल्व थ्योरी – जैसे प्रेशर कुकर में भाप निकलने का वाल्व होता है, वरना फट जाएगा।
लाला लाजपत राय ने अपनी किताब में लिखा – "ये कांग्रेस ब्रिटिशों की बनाई हुई थी, ताकि क्रांति को रोका जाए।" मार्क्सवादी इतिहासकार आर.पी. दत्त ने तो इसे "बुर्जुआ समझौता" तक कह दिया।
लेकिन सबसे बड़ा ट्विस्ट? वो 7 सीक्रेट रिपोर्ट्स आज तक कहीं नहीं मिलीं। न ब्रिटिश आर्काइव में, न भारतीय में। जैसे गायब हो गईं। क्या ये रिपोर्ट्स सच में थीं... या सिर्फ बहाना था कांग्रेस बनाने का?
कांग्रेस की स्थापना (1885):
भाग 2: गांधीजी आए – और खेल पलट गया
लेकिन बाद में कांग्रेस ही स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्य पार्टी बनी, गांधीजी के नेतृत्व में नमक सत्याग्रह, असहयोग, भारत छोड़ो जैसे आंदोलन चलाए। यह ब्रिटिशों के खिलाफ ही थी।शुरू के 30-35 साल कांग्रेस बहुत शांत थी। हर साल क्रिसमस के आसपास मीटिंग, चाय-पानी, प्रस्ताव पास – "महारानी से प्रार्थना है कि हमें ज्यादा अधिकार दें।" ब्रिटिश हंसते थे – "अरे ये तो हमारे लिए खतरा नहीं, बल्कि मदद कर रहे हैं।"
फिर 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ। 1920 में महात्मा गांधी आए।
और खेल पूरी तरह बदल गया।
असहयोग आंदोलन – लाखों लोग ब्रिटिश नौकरियां छोड़ रहे, स्कूल छोड़ रहे। नमक सत्याग्रह – गांधीजी दांडी मार्च कर रहे, दुनिया देख रही। भारत छोड़ो आंदोलन 1942 – "करो या मरो"।
ब्रिटिश अब डर गए। हजारों-लाखों कांग्रेसियों को जेल में डाला। गांधीजी को बार-बार गिरफ्तार किया।
अब सोचो – अगर कांग्रेस सच में ब्रिटिशों की बनाई हुई थी, तो वे अपने ही "एजेंट" को इतना क्यों सताते?
भाग 3: गांधी-इरविन पैक्ट – वो समझौता जिसे लोग "गद्दारी" कहते हैं
1931 में गांधीजी और वायसरॉय लॉर्ड इरविन के बीच 8 लंबी मीटिंग्स हुईं। कुल 24 घंटे बात हुई।
अंत में एक डील हुई –
- कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन रोकेगी।
- ब्रिटिश हजारों कैदियों को छोड़ेंगे।
- गांधीजी लंदन जाएंगे राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में।
कई लोग आज भी कहते हैं – "गांधीजी ने आंदोलन बीच में क्यों रोका? क्या कोई गुप्त डील थी?"
सुभाष बोस ने तो खुलेआम कहा – "ये समझौता गलती थी।" भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को फांसी हो गई – गांधीजी कोशिश किए, लेकिन नहीं बचा पाए।
लेकिन दूसरी तरफ – ये पैक्ट ब्रिटिशों की कमजोरी दिखाता था। वे गांधीजी के आंदोलन से इतना डरे हुए थे कि बातचीत करने को मजबूर हुए।
भाग 4: 1947 की आजादी – सच में आजादी थी या ट्रांसफर ऑफ पावर?
अब सबसे बड़ा सवाल – 15 अगस्त 1947 को जो हुआ, वो आजादी थी या सिर्फ सत्ता का हस्तांतरण?
कुछ लोग कहते हैं:
- ब्रिटिशों ने कांग्रेस को सत्ता सौंपी क्योंकि वे जानते थे कांग्रेस उनके हितों की रक्षा करेगी।
- नेहरू-गांधी परिवार और माउंटबेटन की दोस्ती बहुत गहरी थी।
- सोशल मीडिया पर वायरल मैसेज – "भारत आज भी क्वीन को पेंशन देता है", "30,000 टन बीफ एक्सपोर्ट करना पड़ता है" – ये सब फेक हैं, लेकिन लाखों लोग मानते हैं।
सच्चाई क्या है?
- WWII के बाद ब्रिटेन कंगाल हो चुका था। अमेरिका दबाव डाल रहा था।
- रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह (1946) – भारतीय नौसैनिकों ने बगावत कर दी।
- पूरे देश में दंगे, अराजकता।
- ब्रिटिशों के पास पैसा नहीं था भारत को कंट्रोल करने का।
वे जाना चाहते थे। जल्दी से।
कांग्रेस ने बंटवारा स्वीकार किया क्योंकि विकल्प और बुरा था – और ज्यादा खूनखराबा।

अंत में सवाल तुझ पर है, भाई
- अगर कांग्रेस ब्रिटिशों की बनाई हुई थी, तो ब्रिटिशों ने उसे इतना ताकतवर क्यों होने दिया?
- अगर गांधीजी ब्रिटिश एजेंट थे, तो चर्चिल उन्हें "नंगा फकीर" क्यों कहता था?
- अगर कोई गुप्त डील थी, तो वो दस्तावेज आज तक क्यों नहीं मिले?
हां, शुरू में ब्रिटिशों ने कांग्रेस को सपोर्ट किया – क्योंकि वो शांतिपूर्ण लग रही थी। लेकिन बाद में वही कांग्रेस ब्रिटिशों की सबसे बड़ी दुश्मन बन गई।और लेने के देने पड़ गए
और यही सबसे बड़ा ट्विस्ट है – ब्रिटिशों ने एक "सुरक्षित वाल्व" बनाया, ता कि हम भारतीयों को रौंदा कुचला जा सके ज़रूरत पड़ने पर जो पढ़े लिखे भारतीय थे उनको समझाया जा सके कि अंग्रेज़ ही बेहतर हैं हिंदुस्तान में ना की आज़ादी लेकिन वो वाल्व इतना बड़ा हो गया कि पूरा कुकर ही फट गया।
अब आपको क्या लगता है?? सच में कोई गुप्त डील थी या ये सिर्फ राजनीतिक प्रोपेगैंडा है?

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